राष्ट्रपति का निर्वाचन 

राष्ट्रपति का निर्वाचन,  Rashtrapati Ka Nirvachan

Rashtrapati Ka Nirvachan

Rashtrapati Ka Nirvachan यानी राष्ट्रपति का निर्वाचन कैसे होता है ! राष्ट्रपति का चुनाव कौन कराता है ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर अगर आप आसान भाषा में समझना चाहते हैं तो इस लेख को आप आखिर तक पढ़ें !

Rashtrapati Ka Chunav Kaun Karta Hai

राष्ट्रपति का निर्वाचन भारत में बहुत दिलचस्प है आप यह बात खुलकर नहीं कह सकते हैं कि सत्ता पक्ष का ही उम्मीदवार का जीतना तय है, अगर आप चुनाव बिंदु को ठीक से समझेंगे तो पता चलेगा कि वाकई राष्ट्रपति का चुनाव बहुत दिलचस्प है !

आप जानते हैं कि भारत का राष्ट्रपति का पद सबसे बड़ा पद माना जाता है इसलिए इसके चुनाव के तरीके भी सर्वश्रेष्ठ हैं ! भारत के राष्ट्रपति का चुनाव का उल्लेख संविधान के आर्टिकल 54 में है उसके अनुसार राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप में होता है जिसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व एकल संक्रमणीय मत पद्धति कहां गया है और राष्ट्रपति का चुनाव एक इलेक्टोरल कॉलेज करता है !

राष्ट्रपति को शपथ सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं इसलिए आप कह सकते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश यह चुनाव कराते हैं ! 

Rashtrapati Ka Chunav Kaise Hota Hai

वोट देने का अधिकार

जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि ही वोट डालने का अधिकार रखते हैं जैसे राज्य के विधान परिषदों के सदस्य और मनोनीत सांसदों को वोट डालने का अधिकार नहीं होता है !

चुने हुए सांसद (लोकसभा एवं राज्यसभा) और चुने हुए विधायक (विधानसभा) ही भारतीय नागरिक के तरफ से राष्ट्रपति के चुनाव के लिए वोट कर सकते हैं !

विधायक के वोटों का संख्या

विधायक एक वोट डालते हैं पर राज्यों की जनसंख्या के अनुसार वोटों की संख्या निर्धारित की जाती है! वोट का वेटेज आपको एक उदाहरण से समझाना चाहता हूं ! मान ले कि  बिहार की जनसंख्या (दस करोड़ से ज्यादा) और विधायकों की संख्या (243) को डिवाइड किया जाता है, उसके फलस्वरूप यह संख्या आता है 427,983.539 !

फिर यह संख्याओं को 1000 से भाग दिया जाता है तो यह संख्या होती हैं  427.983539, अगर शेष 500 से ज्यादा हो तो वेटेज में 1 जोड़ दिया जाता है। यानी कि आप यह कह सकते हैं कि बिहार के विधायकों का वोट का वेटेज लगभग 428 हो सकता है ! यह संख्या वास्तविक नहीं है यह एक उदाहरण है ! 

सांसदों के वोटों का संख्या

विधायक की तरह सांसद भी राष्ट्रपति चुनाव में एक वोट डालते हैं पर उसका वेटेज अलग होता है वह निर्भर करता है राज्यों की जनसंख्या अनुपात पर, इस गणित को भी मैं उदाहरण दे कर आपको समझाना चाहता हूं !

उदाहरण के तौर पर बिहार के सांसद को ले रहा हूं, सबसे पहले सभी विधायकों के वोटों की संख्या को जोड़ा जाता है! बिहार में लगभग एक विधायक का वोट का वेटेज लगभग 428 है और बिहार में विधायकों की संख्या 243 है,  इसे जोड़ा के फलस्वरूप 104,004 का संख्या आता है !

राज्यसभा (16) एवं लोकसभा ( 40) के सांसदों का संख्या जोड़ा जाता है जो संख्या आता है (56) उसे विधायकों के संपूर्ण मतों वेटेज की संख्या से डिवाइड किया जाता है ( 104,004 ÷ 56 =) 1,857.21429 यानी क्या कर सकते हैं कि बिहार के एक सांसद का एक वोट का वेटेज होता है लगभग 1857  !

अगर इस प्रकार भाग देने पर शेष 0.5 से ज्यादा बच जाए तो वेटेज में 1 और अंक जोड़ दिया जाता है ! यह संख्या वास्तविक नहीं है यह एक उदाहरण है ! 

एकल हस्तांतरणीय वोट की पद्धति

सांसद और विधायक अपना वोट बैलट पेपर के द्वारा डालते हैं जिनमें उन्हें पहला, दूसरा…..  पसंद बताना होता है ! राष्ट्रपति पद के सभी उम्मीदवारों का अपने वोट में प्रायॉरिटी बताना पड़ता है, क्योंकि वोटो का गिनती का गणित काफी अनोखा है ! जिसमें वोट दूसरे उम्मीदवार को भी जा सकता है!

वोटों की गिनती का गणित

राष्ट्रपति का निर्वाचन में सबसे ज्यादा वोट हासिल करने से ही जीत तय नहीं माना जाता है । राष्ट्रपति वही बनता है, जो वोटरों यानी सांसदों और विधायकों के वोटों के कुल वेटेज का 50% से ज्यादा हिस्सा हासिल कर लें । जो प्रत्याशी सबसे पहले यह कोटा हासिल करता है, उसे राष्ट्रपति चुन लिया जाता है।

अगर कोई उम्मीदवार कुल वेटेज का 50% से ज्यादा हिस्सा हासिल ना किया हो

सब पहले उस उम्मीदवार को रेस से बाहर किया जाता है, जिसे पहली गिनती में सबसे कम वोट मिले हों। परंतु उसको मिले वोटों में से यह देखा जाता है कि उनकी दूसरी पसंद के कितने वोट किस उम्मीदवार को मिले हैं, फिर सिर्फ दूसरी पसंद के ये वोट बचे हुए उम्मीदवारों के खाते में ट्रांसफर किए जाते सकते हैं।

यदि ये वोट मिल जाने से किसी उम्मीदवार के कुल वोट तय संख्या तक पहुंच गए तो वह उम्मीदवार विजयी माना जाता है । अन्यथा दूसरे दौर में सबसे कम वोट पाने वाला रेस से बाहर किया जाता एवं यह प्रक्रिया फिर से दोहराई जा सकता है । इस तरह वोटर का सिंगल वोट ही ट्रांसफर हो जाता है।

अगर अंत तक किसी प्रत्याशी को तय कोटा वोट न मिले, तो भी इस प्रक्रिया में उम्मीदवार बारी-बारी से रेस से बाहर होते रहते हैं और आखिर में जो बचे जाता उसे ही विजयी माना जाता है !

यानी यह कह सकते हैं ऐसे वोटिंग सिस्टम में कोई सत्ताधारी अपने दम पर जीत का फैसला नहीं कर सकता है। दूसरे छोटे अन्य पार्टियों के वोट निर्णायक साबित हो सकते हैं।

यानी जरूरी नहीं कि लोकसभा और राज्यसभा में जिस पार्टी का बहुमत हो, उसी का उमेदवारी राष्ट्रपति बन सकता है। विधायकों का वोट भी अहम होता है  ! अर्थात यह कह सकते हैं कि जिस पार्टी की सरकार केंद्र में हो और उसी पार्टी की सरकार भारत के ज्यादातर बड़े राज्यों में हो तो यकीनन यह कहा जा सकता है कि उसका समर्थित उम्मीदवार का जीत लगभग तय है ! आप खुलकर कह सकते हैं कि अपने देश का राष्ट्रपति का निर्वाचन वाकई दिलचस्प है ! 

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