किशनगंज जिला, बिहार का इतिहास - पाषाण युग से अब तक

किशनगंज जिला, बिहार का इतिहास - पाषाण युग से अब तक | History of  Kishanganj in Hindi

History of  Kishanganj in Hindi

History of  Kishanganj - किशनगंज का इतिहास पूर्णिया से जुड़ा है क्योंकि यह पहले पूर्णिया जिला का भाग था! 14 जनवरी 1990 को किशनगंज जिले आस्थापना मिली थी ! किशनगंज जिला वर्तमान समय में पूर्णिया प्रमंडल का एक जिला है !

पूर्णियाँ एक प्राचीन व गरिमापूर्ण स्थान रहा है ! गौरवपूर्ण इस संबंध हिन्दू धर्म का महाभारत, इस्लाम का हज़रत अबु बकर सिद्दीक़, और बुद्धिस्ट का हरसा से रहा है ! 14 फरवरी 1770 को इस जिले की स्थापना ब्रिटिश सरकार ने की थी यहां का पहला कलेक्टर डुकरेल जबकि अंतिम कलेक्टर मोहम्मद अली खान थे !

पूर्णियाँ का इतिहासिक नाम

इस प्रांत का नाम इतिहासकारों ने यहां की भौगोलिक स्थिति एवं धार्मिक उदय से प्रेरित होकर इस प्रांत का नाम पुरनिया रखा था ! इस प्रांत का भौगोलिक स्थिति अनोखा है क्योंकि यह प्रांत तीन नदियों (गंगा, कोशी एवं महानन्‍दा) के त्रिकोण, हिमालय पर्वत का शीर्ष, काला पानी और घने जंगलों संगम था! इस प्रांत को विभिन्न धर्मों से जोड़कर देखा जाता है जैसे हिंदू, इस्लाम, बौद्ध, जैन एवं सिख !

पूर्णिया नाम की उत्पत्ति की कई संभावनाएं हो सकती हैं दिन में प्रमुख हैं! संस्कृत शब्द पूर्ण-अरन्या से उत्पन्न हो सकता है, जिसका अर्थ है "पूर्ण जंगल" ! पुरनिया की उत्पत्ति जिसे purain या लोटस (कमल) शब्द से लिया गया है, जो कि कोसी और महानंद नदियों पर उगाया जाता है।

पूर्णिया की ऐतिहासिक एवं वर्तमान क्षेत्र

600 ईसा पूर्व के शुरुआत में इस प्रांत का पश्चिमी भाग अंग्ना के राज्य हिस्सा था जबकि पूर्वी भाग पुंड्रा-वर्धा राज्य का हिस्सा था जो कि महानंदा, कोसी और हिमालय का क्षेत्र हुआ करता था मौजूदा समय के हिसाब से देखें तो भागलपुर का भी कुछ हिस्सा पूर्णिया जिला का भाग था उसके साथ मालदा और दार्जिलिंग का भी कुछ हिस्सा इसी क्षेत्र में आता था !

अगर ब्रिटिश काल की बात करें तो, 10 फरवरी 1770, ब्रिटिश हुकूमत ने पूर्णिया का सीमांकन किया जिसमें दार्जिलिंग समेत कई अन्य क्षेत्रों को पूर्णिया से अलग कर दिया गया था ! उसके बाद 14 फरवरी 1770 को पूर्णिया जिले की स्थापना की गई थी ! 1912 में बंगाल का विभाजन के फलस्वरूप बिहार नाम का राज्य के अस्तित्व में आया था जबकि 1935 में उड़ीसा इससे अलग कर दिया गया।

पूर्णिया प्रमंडल

1990 में पूर्णिया प्रमंडल बना जिनमें चार जिले शामिल थे उनका नाम है पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया  ! भागलपुर और पूर्णिया के बीच में परिसीमन 1990 में ही हुआ था जिसमें पूर्णिया का कुछ भाग भागलपुर जिले में शामिल किया गया था !

पूर्णिया का प्राचीन इतिहास

पूर्णिया का इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो,आपको गर्व होगा! पूर्णिया का इतिहास कितना पुराना है कि आपने कभी सोचा नहीं होगा और उनके साथ अभी भी मौजूद हैं !

पाषाण युग (70000 से 3300 ई.पू) - इस क्षेत्र में इस समय घने जंगलों के साथ काला पानी नदियों में बहा करता था जो भौगोलिक दृष्टि से मनुष्य जाति के लिए उपयुक्त नहीं था !

सिन्धु घाटी सभ्यता- (3300-1700 ई.पू) - किसी भी इतिहासकार ने इस क्षेत्र का विशेष वर्णन नहीं किया है !

वैदिक काल (1500–500 ई.पू) -

आर्यो का आगमन काल माना जाता है जिसमें आर्यावत क्षेत्र का उदय हुआ जिसमें बंगाल और बिहार शामिल था! डॉ. जैकोबी के शोध से पता चला था कि काँसे के उपकरण व कवच जो आर्यो ने इस्तेमाल किया था इसी क्षेत्र से प्राप्त हुआ था ! महानंदा नदी पारंपरिक रूप से आर्यन के प्रभाव क्षेत्र शामिल हो गया था !

मगध साम्राज्य (545–320 ई.पू) - मगध साम्राज्य का राजधानी पाटलिपुत्र था जिसे लोग अभी पटना के नाम से जानते हैं इस साम्राज्य का विस्तार पुर्णिया के साथ अखण्ड भारत के रूप में हो गया था ! शताब्दी के महान बौद्ध सम्राट हर्ष, के मौत के बाद पूर्णिया आदित्यसेन के अधीन मगध साम्राज्य का हिस्सा बन गया था

चन्द्रगुप्त मौर्य (322 ईसा पूर्व- 298 ईसा पूर्व) -  बिहार में नंद वंश का राजा धननंद शासन के कुछ सालों के बाद चंद्रगुप्त का उदय हुआ था !

शुंग साम्राज्य (184–123 ई.पू)

मौर्य वंश का अंत के बाद शुंग साम्राज्य का उदय हुआ, पुष्यमित्र पहले राजा बने और पूर्णिया के साथ पूरे भारत में अपना साम्राज्य स्थापित किया था !

कण्‍व राजवंशलगभग (73 - 28 ई. पू.)

वासुदेव राजा बने उनका शासन बिहार के साथ उत्तर प्रदेश के कुछ भागों तक सीमित हो गया जिसमें पूर्णिया भी शामिल था ! 

नौवीं सदी से 12 वीं शताब्दी तक यह पाल राजा के अधीन था, और बाद में सेना के अधीन हो गया था ! सातवीं शताब्दी की शुरुआत में अब जिले का शासन शासन्ना अधीन था जो एक शक्तिशाली राजा थे !

पूर्णिया का मध्यकालीन इतिहास - मुस्लिम शासकों का दौर

मोहम्‍मद बिन बख्तियार ख़िलजी

तेरहवीं शताब्दी की शुरुआत में मोहम्‍मद बिन बख्तियार ख़िलजी ने पूर्णिया को अपने शासन क्षेत्र में शामिल कर लिया था ! बिहार पर सबसे पहले विजय पाने वाला मुस्लिम शासक ख़िलजी थे !

तुग़लक़ वंश ( 1320-1414 ई.)

ग़यासुद्दीन ने तुग़लक़ वंश की स्थापना की, उस समय पूर्णिया का शासन तुग़लक़ वंश के अधीन था !

मुग़ल वंश (1526–1857 ई.)

मुगल शासन के शुरुआती दिनों में पूर्णिया मुगल साम्राज्य का एक सैन्य प्रांत था! उत्तर पूर्व की जंगली जातियों के हमलों के खिलाफ अपनी सीमाओं की रक्षा में सैन्य प्रांत बनाया था!

ऐन-ए-अकबारी विश्वविख्यात इतिहासिक ग्रंथ में पूर्णिया का नाम शामिल है जिसमें महानंदा नदी का व्याख्या किया गया है !

सत्तरहवीं शताब्दी (1722) के प्रारंभ में एक फौजदार को नवाब के पद के साथ नियुक्त किया गया था जिसे राजस्व और सीमा रक्षा का कार्य सौंपा गया था! महानतम नवाबों में सैफ खान का नाम प्रसिद्ध है जिस ने इस किला को बनाया था ! अभी भी पूर्णिया शहर से 30 किलोमीटर उत्तर जलालगढ़ में स्थित है ! इसके लिए किले को बनवाने का मकसद था नेपाली लुटेरों से छुटकारा पाना! एक बार बीरनगर राजा ने 15,000 घुड़सवार सेनाओं के साथ हमला कर दिया था, जहांगीर के वफादार सैयद मुहम्मद जलाल-उद-दीन युद्ध में नेपाली राजा को हराया था!

1757 से पहले बिहार राज्य का कमान सिराजुद्दौला के हाथ में था, हार के बाद 1765 में बंगाल के साथ पूर्णिया का शासन ब्रिटिश सरकार के कब्जे में आ गया था  !

ब्रिटिश हुकूमत में राज्यों और जिलों का विभाजन

10 फरवरी 1770, ब्रिटिश हुकूमत ने पूर्णिया का सीमांकन किया जिसमें दार्जिलिंग समेत कई अन्य क्षेत्रों को पूर्णिया से अलग कर दिया गया था ! उसके बाद 14 फरवरी 1770 को पूर्णिया जिले की स्थापना की गई थी ! 1912 में बंगाल का विभाजन के फलस्वरूप बिहार नाम का राज्य के अस्तित्व में आया था जबकि 1935 में उड़ीसा इससे अलग कर दिया गया।

ब्रिटिश कलेक्टरों का दौर

पूर्णिया जिला का पहला ब्रिटिश कलेक्टर का नाम डुकरेल था  जबकि अंतिम कलेक्टर मोहम्मद अली खान थे ! डुकरेल को इतिहास में सुधारों के लिए याद किया जाता है जिसने सती प्रथा के विरुद्ध लोगों को जागरुक करने का काम क्या था !

ब्रिटिश गवर्नमेंट में पूर्णिया का विकास

शिक्षा

दार्जिलिंग के लोरेटो सम्मेलन के ननं 1882 के करीब पूर्णिया में आए थे और पूर्णिया जिले के बच्चों के लिए एक दिन विद्यालय और बोर्डिंग स्कूल भी खोला था। जब बंगाल के जेसुइट मिशन ने पूर्णिशिया मिशन को कैपचिन मिशन से ले लिया, तो स्कूल बंद हो गया और नन दार्जिलिंग में लौट आए। यह घर अब भी मजौद है और कम्बलिन के रूप में जाना जाता है। यह पूर्णिया शहर में सबसे पुराने घरों में से एक है ! 1921 में, कटिहार में एक राष्ट्रीय स्कूल शुरू हुआ था।

यातायात

ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी ने 1888 में मनिहिरी-कटिहार-कसबा खंड रूप किया था ! उसके अगले साल 1889 में बारसोई-किशनगंज खंड परिचालन शुरू किया था ! आप कह सकते हैं कि यह स्टेशन 129 साल से ज्यादा पुराना रेलवे स्टेशन है ! भारत में सबसे पहला ट्रेन मुंबई और ठाणे के बीच 16 अप्रैल 1853 में ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी ने चलाया था !

सन 1878 सिलीगुड़ी और कोलकाता के बीच में पहला रेल चलाया गया था, उसके बाद सन 1915 में कटिहार रेलवे स्टेशन को सिलीगुड़ी, किशनगंज और दालकोला से जोड़ा गया था! पहली बार सन 1915 में कटिहार रेलवे स्टेशन का रेल संपर्क कोलकाता से हो चुका था ! आजादी की लड़ाई के समय कटिहार कलकत्ता रेलखंड का उपयोग बंद हो गया था जिससे कई सालों के बाद शुरू किया जा सकता था !

ब्रिटिश काल में बहुत सारे लकड़ी के पुल एवं पक्की सड़कों का निर्माण हुआ था जिसके साक्ष्य अभी भी मौजूद हैं !

स्वास्थ

19वी सदी के शुरुआत में कटिहार व पूर्णिया में अस्पताल का निर्माण हुआ था शुरुआती समय में सिर्फ ब्रिटिश ऑफिसर के लिए यह अस्पताल सेवा प्रदान करती थी लेकिन 1934 का भूकंप के बाद भारतीयों के लिए भी सेवा शुरू किया था ! 1915 से लेकर 1925 स्वास्थ्य के हिसाब से पूर्णिया का इतिहास का सबसे खराब माना जाता है क्योंकि इस समय लोगों को हैज़ा, चिकन पॉक्स और मलेरिया के गंभीर बीमारी ने लाखों लोगों की जान ली थी !

कृषि

ब्रिटिश काल में पूर्णिया वासियों का प्रमुख पेशा कृषि हुआ करता था, कृषि उत्पादन का एक चौथाई हिस्सा ब्रिटिश सरकार लगान के तौर पर किसानो से वसूल करता था ! ब्रिटिश अधिकारी यहां के लोकल लोगों को भी लगान वसूली में जमीनदारी व सरकार का पद दिया था जो भारतीयों से एक चौथाई से ज्यादा का लगान के तौर पर किसानों से लिया करते थे जिससे किसानों की हालत इस दौर में सबसे खराब था !

भारत की आजादी की लड़ाई में पूर्णिया का योगदान

पूर्णिया में आजादी की लड़ाई की शुरुआत किसानों ने शुरू किया थी, 1922-23 के आसपास मुंगेर में किसान सभा का गठन हुआ था ! किसान सभा का आंदोलन किसानों की समस्या से जुड़ा था! 1940-41 के बाद, किसानसभा आंदोलन धीरे-धीरे कांग्रेस आंदोलन में विलय हो गया था ! 

पूर्णिया के छात्रों ने

स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव सबसे पहले बिहार में पूर्णिया के छात्रों पर पड़ा था! पूर्णिया के अतुल चंद्र मजूमदार, बीएन कॉलेज के छात्र थे, पटना में उसे भारत के रक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। उस समय पूर्णिया के आसपास उच्च शिक्षा के लिए कॉलेजों की भारी कमी थी कुछ ही छात्र पटना या कोलकाता जाकर उच्च शिक्षा ले पाते थे ! छात्र के गिरफ्तारी के बाद पूर्णिया और उसके आसपास के जिले के छात्र संगठित होकर स्वदेशी आंदोलन को बड़ा बनाया था, इसकी व्याख्या गांधी जी ने अपने एक लेख में की है !

पूर्णिया जिला, अविभाजित बंगाल के कई जिलों के बहुत करीब से, 20 वीं सदी के पहले दशक में स्वदेशी आंदोलन से तुरंत प्रभावित हुआ था। उस समय पूर्णिया जिले में उच्च शिक्षा के लिए कोई सुविधाएं नहीं थीं और जो छात्र उच्च शिक्षा मांग रहे थे उन्हें कलकत्ता या पटना जाना पड़ा। बिहार नेशनल कॉलेज और टीके घोष अकादमी को एक गुप्त छात्र संगठन के लिए दो केंद्रों के रूप में संदेह था, जो राजद्रोह में शामिल था और दोनों संस्थानों में पूर्णिया के छात्रों का छिड़का हुआ था। पूर्णिया से एक लड़का, अतुल चंद्र मजूमदार, बीएन कॉलेज के एक छात्र, पटना को भारत के रक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था।

गोकुल कृष्ण रॉय व सत्येंद्र नारायण रॉय एवं अन्य सामाजिक संगठन के नेताओं ने 1920 मैं कांग्रेस द्वारा आयोजित नागपुर सत्र में भाग लिया! राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का हिस्सा बने ! श्री राजेन्द्र प्रसाद ने 1921 में पूर्णिया जिले का दौरा किया और उन्होंने कई सभाएं की जिनमें उन्होंने किसानों और छात्रों को संगठित किया !

महात्मा गांधी जी 1929 में पूर्णिया आये थे, उस समय के दौरान उन्होंने नाजगूंज के राजा से मुलाकात की और किशनगंज, बिश्नुपुर, अररिया और पूर्णिया सहित विभिन्न स्थानों पर भीड़-भाड़ की बैठक को संबोधित किया।

1942 में संपूर्ण भारत आंदोलन की रणनीति पूरी तरह से पूर्णिया के लोगों ने बनाया था इस आंदोलन ने अंग्रेजी सरकार की जड़ तक को हिला कर रख दी थी ! आखिरकार 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली इस तरह पूर्णिया भी आजादी के जश्न में डूब गया लेकिन कुछ यादों के साथ !

आपको बता दूं की बिहार में पूर्णिया जिला का तीसरा स्थान है जहां से ज्यादा लोग जेलों में गए और उसे फांसी हुई थी, पूर्णिया के इस गौरवपूर्ण इतिहास को नहीं भुलाया जा सकता और अपने महापुरुषों की बलिदान को हमें हमेशा याद रखना चाहिए !

आजादी के बाद पूर्णियाँ

आजादी मिलने के समय पूर्णिया की स्थिति बहुत ही भयावह थी लोगों के पास काम नहीं के बराबर थे किसान आत्महत्याएं कर रहे थे! बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह पूर्णिया की समस्याओं को पूरे देश से अवगत कराया उन्होंने निदान करने के लिए हरसंभव कोशिश की थी !

बिहार के पहले हरिजन मुख्यमंत्री पूर्णिया से

1968 में बिहार को पहला हरिजन मुख्यमंत्री पूर्णिया से मिला, श्री भोला पासवान शास्त्री के रूप में जिनका जन्म 1914 में काझा कोठी के पास बैरगाछी गांव में हुआ था ! शास्त्री जी BHU से स्नातक डिग्री हासिल करने के बाद आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे ! वे  बिहार के तीन बार मुख्यमंत्री बने (वर्ष 1968,1969 और 1971) ! शास्त्री जी ईमानदारी और सादगी के प्रतीक माना जाता है क्योंकि उसके परिवार अभी भी सिर्फ 6 डिसमिल जमीन की संपत्ति के साथ जीवन यापन कर रहे हैं ! वे 1972 में राज्यसभा सांसद मनोनीत हुए थे और वह केन्द्र सरकार में मंत्री भी बने. उनका मौत 4 सितंबर 1984 को हुआ था!